मंगलवार, 14 सितंबर 2010

                            अपने लिए नहीं ..जरा ऊनके लिए सोचो....
अंग्रेजी आज हम पर इसलिए राज कर रही है कि हमने उसे अपने सिर पर बैठा रखा है, अपना मानस ऐसा बना रखा है कि अगर हमने हिंदी पढ़ी तो पीछे रह जायेंगे। आगे बढ़ने, अच्छी नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी पढ़ना जरूरी है। हमने अपने   गिर्द अंग्रेजी के व्यामोह का वह जाल बुन रखा है, जिसमें हम खुद बंदी बन कर रह गये हैं और अपने सशक्त हिंदी भाषा की अपार शक्ति को भूल गये हैं। वह भाषा जिसमें सशक्त साहित्य का भंडार है और न सिर्फ देश बल्कि विदेश में भी समादृत है, प्रशंसित है। दरअसल वैश्वीकरण के इस दौर में लोगों को न तो राष्ट्र की चिंता है और न ही राष्ट्रभाषा की। हमारे यहां ज्यादातर लोग पैसा कमाने की अंधी दौड़ में शामिल हो गये हैं। इस दौड़ में शामिल लोग अपने घर-परिवार तक को भूल जाते हैं फिर उनके पास भाषा की चिंता करने की फुरसत कहां। बच्चे या तो कन्वेंट में डाल दिये है या फिर विदेश में पड़ रहे हैं, उनके मुंह से तो बस अंग्रेजी जुमले ही फूटते हैं और माता-पिता खुश कि उनका बेटा या बेटी सालाना करोड़ों रुपयों की नौकरी पा लेगी। व्यवसायी घराने के हुए तो फिर यह उम्मीद कि उनके व्यवसाय को सात समुंदर पार फैलाने में उनके कुलदीपक सफल होंगे। उन्हें क्या फिक्र हिंदी की उसके बारे में सोचें तो गरीब तबके या या मध्यम वर्ग के लोग सोचें जो अपने बच्चों को खर्चीले अंग्रेजी स्कूलों मे भेज नहीं सकते और विदेश में उनको पढ़ने भेजने का सपना तो वे देख ही नहीं सकते।ऐसे में अगर हम आज नहीं चेते तो आने वाले कल के लिए भविस्य स्याह बना रहे हैं....अपने लिए नहीं बल्कि ऊन लोगो के लिए जो आज भी 20 रूपये से कम कमाकर गुजारा करते हैं । इसलिये हिन्दी पर भी ध्यान देना ऊतना ही आवश्यक है जितना की अंग्रेजी भाषा पर .। भाषा कोई भी हो खराब नहीं होता है ...रोजी रोटी जिससे मिले वही सम्मान के असली हकदार है चाहे वह हिन्दी हों या फिर अंग्रेजी । शेष आगे .....

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